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Supercomputers of the world

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Technology is always in constant flux, hopefully moving forward and improving at any given time. One need only look at some of the world’s more advanced supercomputers to gain an understanding of just how far things have moved forward in the last 5-10 years or so. Right now, we’re going to take a look at the fastest supercomputers out there, perhaps even delving into the specifics with regards to what makes them so powerful.

1. China’s impressive Tianhe-2: It is said to currently be the world’s fastest supercomputer. According to sources, the machine was constructed by no less than around 280 people over the course of a couple of years and was designed to assist with the study of biomedicine. So, just how fast is it, you ask? Try 33.86 petaflops on the Linpack benchmark… In other words, simply operating the machine for an hour or two is basically equivalent to having nearly 1 ½ billion people continuously working for over 1000 years.

2. US supercomputer called “Titan”: It clocks in at 17.59 petaflops (LINPACK) {with a theoretical peak of around 27 petaFLOPS}. Used in a wide variety of science projects, Titan used to be the world’s fastest supercomputer until it was eclipsed by Tianhe-2. Actually, Titan is still relatively new as it becomes operational on October 29, 2012, is built upon the infrastructure of an older supercomputer called “Jaguar”. According to sources, Titan is to be replaced by a new system by 2016 which clocks in at 200 petaflops.

3. IBM’s “Sequoia”: It is said to currently be the world’s 3rd fastest supercomputer in existence. As far as the impetus for building Sequoia, the machine was built to assist with ASC operations (or, advanced simulation and computing) including projects conducted by the National Nuclear Security Administration. In terms of its Linpack performance, Sequoia clocks in at around 16.32 petaflops. Like the others, Sequoia also briefly held the title as the world’s fastest supercomputer at one time, snatching the title away from its predecessor, the “K computer”. Some groundbreaking simulations have been run on Sequoia, including a multi-petaflop simulation of the cosmos as well as an electrophysiological model of the human heart.

4. Next one is “K computer”, Japan’s 10.51 petaflop-scale supercomputer which is housed at RIKEN Advanced Institute for Computational Science. Based largely on the LINUX kernel, the K computer is used to assist with medical as well as climate research. When it came online in June of 2011, K computer was known as the world’s fastest, only to be eclipsed by the machine above, Sequoia.

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Indian News

जगदलपुर से “भंजदेव” का लड़ना लगभग तय

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कमल चंद्र भंजदेव

सूत्रों से मिली ख़बर के अनुसार !!
बस्तर महाराज व छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष कमल चंद्र भंजदेव का बस्तर जिला मुख्यालय के एकमात्र सामान्य सीट जगदलपुर से आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के रूप में उतरना लगभग तय हो चुका है. जगदलपुर से श्री भंजदेव को लड़ाकर भाजपा पूरे बस्तर संभाग को साधने के फिराक में है. भाजपा रणनीतिकारों की योजना श्री भंजदेव के प्रति आदिवासियों की आस्था को वोट में तब्दील करवाकर बस्तर संभाग के पूरे 12 विधानसभा सीटों में अधिकाधिक लीड बनाकर लगातार चौथी बार भाजपा सरकार बनाने की है. बस्तर सहित कांकेर क्षेत्र में भी उच्च शिक्षित युवा नेता श्री भंजदेव का स्टार प्रचारक के रूप में उपयोग पार्टी नेतृत्व करने जा रही है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों से खबर आ रही है कि जगदलपुर से श्री भंजदेव की उम्मीद्वारी के बहाने भाजपा की नजर बस्तर रियासत के प्रभाव वाले 18 विधानसभा सीटों पर है, जहाँ श्री भंजदेव के प्रभाव का इस्तेमाल कर स्थितियाँ पार्टी के अनुकूल बनाई जा सकती है. गौरतलब है कि भाजपा प्रवेश के बाद से ही श्री भंजदेव लगातार पार्टी को मजबूत करने में लगे हुए हैं. लगभग डेढ़ साल से चल रहे देवगुड़ी वंदन यात्रा के अभिनव पहल को मिल रही ऐतिहासिक सफलता और यात्रा के दौरान प्रत्येक जगह श्री भंजदेव के स्वागत व उन्हें सुनने उमड़ रही भीड़ से उनकी लोकप्रियता व जनता के बीच उनके प्रति आस्था का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

कमल चंद्र भंजदेव

कमल चंद्र भंजदेव

 

बस्तर की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता व परंपराओं को बचाए रखने व उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वे जागरूकता अभियान भी चला रहे हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आत्मा ‘राष्ट्रीयता व सनातन संस्कृति की रक्षा’ के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए श्री भंजदेव लगातार धर्मांतरण का विरोध करते हुए आदिवासियों के रोजगार व स्वालंबन हेतु प्रयासरत हैं. अंदरूनी सर्वे रिपोर्ट में भी कमल चंद्र भंजदेव जीतने योग्य मजबूत प्रत्याशी के रूप में पाए गए हैं, उनकी उम्मीद्वारी व नेतृत्व को बस्तर एक नई उम्मीद के रूप में देख रहा है.

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ओपी के जुड़ने से खरसिया में भाजपा हुई मजबूत

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रायगढ़ जिले के खरसिया के छोटे से गांव बयांग के किसान परिवार में जन्मे ओपी चौधरी ने कक्षा 1ली से 5वी तक की पढ़ाई शासकीय प्राथमिक शाला बयांग, कक्षा 6वीं से 8वीं तक की पढ़ाई शासकीय मिडिल स्कूल जैमूरा और 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नंदेली से पूरी की। अपने संघर्ष से वह छत्तीसगढ़ के पहले IAS बने और अपने गांव की माटी को गौरवान्वित किया।
ओपी जैसे पट छत्तीसगढ़िया के राजनीति में आने को एक क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा पर जो सेठिया राजनीति का आरोप लगता रहा है, ओपी उसका काट साबित होंगे। ओपी के रुप में भाजपा ने खरसिया विधानसभा के महान भाग्य की रुपरेखा तैयार कर ली है। जब ओपी का उदय होगा तो भाजपा की सत्ता का केंद्र एक छोटा सा गाँव होगा।

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रायपुर कलेक्टर ओपी चौधरी का इस्तीफा मंजूर!

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ओपी चौधरी

भारत सरकार ने रायपुर कलेक्टर ओपी चौधरी का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। पता चला है, प्रधानमंत्री सचिवालय ने कल देर शाम इस्तीफे की स्वीकृति पर मुहर लगा दी।
ज्ञातव्य है, 16 अगस्त को अपना इस्तीफा मुख्य सचिव अजय सिंह को सौंप दिया था। सीएम की अनुशंसा के बाद 17 अगस्त को उन्होंने केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय को ओपी का इस्तीफा भेज दिया था।

ओपी चौधरी

ओपी चौधरी

ओपी 2005 बैच के आईएएस थे। वे रायगढ़ के बायंग गांव के रहने वाले हैं। खरसिया से उन्हें कांग्रेस के उमेश पटेल के खिलाफ विधानसभा चुनाव में उतारने की भाजपा की योजना है। जब वह दंतेवाड़ा के कलेक्टर थे तो उन्होंने अपने कार्यकाल में दंतेवाड़ा को एजुकेशन सिटी के तौर पर पहचान दिलाई | उन्हें पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में बेहतरीन काम के लिए प्राइम मिनिस्टर अवॉर्ड भी मिल चुका है | इसके अलावा वह रायपुर में नालंदा परिसर तैयार करवा चुके हैं | ये राज्य का पहला लर्निंग सेंटर है, जो 24 घंटे चलता है |
8 साल की उम्र में चौधरी के पिता का निधन हो गया था। ऐसे में मां ने मेहनत करके उन्हें पढ़ाया। इसी वजह से 12वीं में ही उन्होंने आईएएस बनने का फैसला ले लिया था। पीईटी में चयन होने के बावजूद उसे छोड़ दिया क्योंकि वह खुद को जिलाधिकारी के तौर पर ही देखना चाहते थे। 23 साल की उम्र में आईएएस अधिकारी बनने और इतनी बड़ी सफलता के बावजूद वो हमेशा अपनी जमीन से जुड़े रहते हैं। इस संबंध में जब उनसे पूछा गया था तो उन्होंने कहा, ‘जैसे ही आप बड़े ओहदे पर आते हैं, आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में आपकी परवरिश और संस्कार ही आपको जमीनी हकीकत से जोड़े रखती है। आज जमीनी हकीकत के जितने नजदीक होते हैं, उतने ही उसपर खरे उतरते हैं।’

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